जितेंद्र कोठारी, वणी | ऑनलाइन दवा बिक्री के विरोध में 20 मई को औषधि विक्रेता संघ द्वारा घोषित भारत बंद को लेकर अब आम नागरिकों के बीच विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं। ऑनलाइन दवा बिक्री और कॉर्पोरेट मेडिकल स्टोर्स के विरोध में किए जा रहे इस बंद को लेकर कई लोगों ने इसे “जनहित” नहीं बल्कि “व्यापारिक हित” से जुड़ा आंदोलन बताया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संदेशों और नागरिकों की प्रतिक्रियाओं में सवाल उठाया जा रहा है कि यदि यह आंदोलन वास्तव में जनता की सेहत और नकली दवाओं के खिलाफ है, तो फिर वर्षों से बाजारों में बिक रहे नकली खाद्य पदार्थों, मिलावटी दूध, घी, मसाले और मिठाइयों के खिलाफ इसी प्रकार का बंद कभी क्यों नहीं किया गया? लोगों का कहना है कि नकली वस्तुएं केवल ऑनलाइन माध्यम से नहीं बिकतीं, बल्कि दवा दुकानों पर भी समय-समय पर नकली दवाएं पकड़ी जाती रही हैं। ऐसे में केवल ऑनलाइन दवा बिक्री को निशाना बनाना कई लोगों को एकतरफा प्रतीत हो रहा है।
नागरिकों के अनुसार असली मुद्दा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से बढ़ती प्रतिस्पर्धा है, जहां ग्राहक अब दवाओं की कीमतों की तुलना कर पा रहा है और कई मामलों में आधी से भी कम कीमत पर दवाएं खरीद रहा है। यही कारण है कि दवाओं पर 200 से लेकर 500 प्रतिशत तक कमाई करने वाले दवा व्यापारियों के पेट में मरोड़ उठ रहा है। यही नहीं कई लोग जो खुद एक किलो प्याज सब्जी विक्रेता से खरीदने की बजाय रिलायंस मार्ट से ऑनलाइन ऑर्डर करते है, वो लोग भी ऑनलाइन दवा बिक्री का विरोध कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा भी जोर पकड़ रहा है कि कई दवाइयों और मेडिकल उत्पादों पर अत्यधिक मुनाफाखोरी की शिकायतें पहले से मौजूद हैं। लोगों का सवाल है कि जब कम कीमत वाली दवाइयां कई गुना अधिक दाम में बेची जाती हैं, तब गरीब मरीजों के हित की चिंता क्यों नहीं दिखाई देती? कुछ लोगों ने यह भी कहा कि आज देश तेजी से डिजिटल हो रहा है। बैंकिंग, टिकट बुकिंग, राशन, अस्पताल अपॉइंटमेंट और अन्य सेवाएं ऑनलाइन हो चुकी हैं, ऐसे में केवल दवा बिक्री को लेकर इतना विरोध समझ से परे है।

हालांकि औषधि विक्रेता संगठनों का कहना है कि ऑनलाइन दवा बिक्री से छोटे मेडिकल व्यवसाय प्रभावित हो रहे हैं तथा बिना उचित नियंत्रण के दवा बिक्री मरीजों के लिए खतरा बन सकती है। वहीं विरोध करने वाले नागरिकों का मानना है कि किसी भी व्यवस्था में गलत काम करने वाले लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि पूरे ऑनलाइन सिस्टम का विरोध।
20 मई के प्रस्तावित बंद को लेकर अब शहर और सोशल मीडिया दोनों जगह बहस तेज हो गई है। एक ओर दवा विक्रेता इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई नागरिक इसे “जनहित की आड़ में स्वहित” का आंदोलन बता रहे हैं।










